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महर्षि दयानंद सरस्वती विश्विद्यालय अजमेर में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन, अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के संयुक्त तत्वावधान में हुआ कार्यक्रम

भारत भूमि (सम्पादक – प्रदीप टिक्यानी)

अजमेर – महर्षि दयानंद सरस्वती विश्विद्यालय अजमेर एवं अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ राजस्थान द्वारा शिक्षा में ऐतिहासिक परिवर्तन की दिशा में भारत की सबसे महत्वपूर्ण पहल – राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की विशेषताओं, उसके क्रियान्वयन की चुनौतियों और संभावनाओं पर एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी के प्रमुख वक्ताओं ने शिक्षा नीति को केवल एक सुधार नहीं, बल्कि सभ्यता-स्तर के पुनर्जागरण के रूप में प्रस्तुत किया। अपने विचार व्यक्त करते हुए कुलगुरु प्रो सुरेश कुमार अग्रवाल ने कहा कि शिक्षा का सुधार के स्थान पर पुनर्जागरण की आवश्यकता है| पहली बार शिक्षा नीति के केंद्र में ‘राष्ट्र’ की संकल्पना को स्थान मिला है नीति का उद्देश्य युवाओं के माध्यम से राष्ट्र के चहुंमुखी विकास के लिए ठोस आधार प्रदान करना है। यह नीति स्थायी नहीं है, बल्कि आवश्यकता के अनुरूप निरंतर संशोधन और समय के साथ अनुकूलन का प्रावधान रखती है। वन नेशन वन सब्सक्रिप्शन जैसी पहलें, छात्रों को तकनीकी युग की चुनौतियों (विशेषकर AI) का सामना करने हेतु सशक्त बनाने के लिए हैं।

इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रो नारायण लाल गुप्ता ने कहा कि मानवीय विकास की गति बहुत धीमी रही है, जिससे हमारे पूर्वाग्रह व मानसिकता (mindset) तेज़ बदलावों के साथ तालमेल नहीं बिठा पाते। शिक्षा तंत्र से जुड़े सभी लोगों को सतर्क और उदार बने रहना होगा। उन्होंने बताया कि 1986 की नीति समयानुकूल थी, किन्तु वह तकनीकी व्यवधानों का पूर्वानुमान नहीं लगा पाई। इसके विपरीत, NEP 2020 एक “डायनेमिक डॉक्यूमेंट” है, जो निरंतर समीक्षा व परिवर्तन की आवश्यकता को मान्यता देता है। नीति का उद्देश्य “भारतीयता पर गर्व करने वाला, ज्ञान-प्रज्ञा-सत्य से संपन्न युवा तैयार करना है, जो 21वीं सदी की चुनौतियों का समाधान हो सके।” AI के कारण कई दोहराव वाले कार्य समाप्त हो रहे हैं और अब केवल 2% सरकारी नौकरी में ही पारंपरिक तैयारी चल रही है। शेष 98% युवाओं को लचीलापन, एनालिटिकल और क्रिटिकल स्किल्स सीखने होंगे। अब आवश्यकता है कि शिक्षा जगत के सभी सदस्य “रीस्किल, रीलर्न और रिन्यू” के सिद्धांत को आत्मसात करें तथा “हाउ टू लर्न” की क्षमता विकसित करें। शिक्षा, ज्ञान, तकनीक और रोजगार के बदलते परिदृश्य में खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए सतत जागरूकता ज़रूरी है।

इस अवसर पर मुख्य वक्ता वरिष्ठ शिक्षाविद हनुमान सिंह राठौड़ ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सर्वप्रथम मानसिक रूप से अपने मस्तिष्क का “डी-कॉलोनाइजेशन” करना आवश्यक है। उन्होंने तर्क दिया कि भारत में शिक्षा की वर्तमान प्रवृत्तियाँ लॉर्ड मैकाले की 1835 में प्रस्तुत पाश्चात्य-प्रधान शिक्षा प्रणाली का परिणाम हैं। अंग्रेजी शिक्षा ने भारतीयों के अपने ज्ञान, ग्रंथों और परंपरा को हीन दृष्टि से देखना सिखाया। जबकि, भारतीय शास्त्रों में बिना दूरबीन के भी पृथ्वी के गोल आकार, ब्रह्मांड की संरचना (नासदीय सूक्त), और वैज्ञानिक अवधारणाओं का उल्लेख मिलता है, जिसे औपनिवेशिक दुष्प्रचार के चलते दबा दिया गया। भारतीय ज्ञान परंपरा को विद्यालय से स्नातकोत्तर स्तर तक, पाठ्यक्रम में समग्र और तर्कसंगत तरीके से शामिल किया जाना चाहिए ताकि विद्यार्थियों में आत्म-जागरण और आत्मगौरव उत्पन्न हो। साथ ही, इस भारतीयता को गतिशील रखकर निरंतर विकास के सिद्धांत का पालन हो। वेद, उपवेद, वेदांग, उपनिषद, दर्शन—इन शास्त्रों से लेकर प्रायोगिक विज्ञान और गणित-खगोल में योगदानकर्ता प्राचीन वैज्ञानिकों के कार्यों को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

इस अवसर पर ABRSM के प्रदेश अध्यक्ष प्रो मनोज कुमार बहरवाल ने बताया कि ABRSM का मुख्य प्रयास यह सुनिश्चित करना है कि NEP “भारतीय ज्ञान परंपरा पर टिकी हुई हो।” इसका उद्देश्य “हमारे भारत का जो स्वदेशी का सत्व है उसको कैसे वापस स्थापित किया जाए। संक्रमण काल के दौर में वामपंथियों के माध्यम से भारत की जो मूल पहचान को किन-किन प्रया प्रयासों से किन-किन से समाप्त करने की कोशिश की जाती है।” इसके विपरीत, ABRSM एक ऐसी शिक्षा नीति का समर्थन करता है “जो शिक्षा नीति हमारे भारत की हो। उसमें भारत का तत्व हो उसमें भारत के दर्शन हो।

कार्यक्रम में आभार ज्ञापन अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो सुभाष चन्द्र ने किया तथा कार्यक्रम का सञ्चालन ABRSM इकाई सचिव प्रो अरविन्द पारीक ने किया |

इस अवसर पर प्रबंध बोर्ड सदस्य प्रो. अनिल दाधीच एवं प्रो. ऋतु माथुर, विश्वविद्यालय के शिक्षक प्रो. सुभाष चन्द्र, प्रो. सुब्रतो दत्ता, प्रो. रीटा मेहरा, प्रो. शिव प्रसाद, यूजीसी दयानन्द चेयर प्रो. नरेश कुमार धीमान, दयानन्द महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. लक्ष्मीकांत शर्मा, डा. आशीष पारीक, प्रो. शिवदयाल सिंह, परीक्षा नियंत्रक डॉ. सुनील कुमार टेलर, वित्त नियंत्रक नेहा शर्मा, डॉ. सूरज मल राव, डॉ. तपेश्वर, प्रो. आशीष भटनागर, प्रो. प्रवीण माथुर, , सहित बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय के कर्मचारी, विद्यार्थी एवं अजमेर नगर से पधारे गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

तकनीकी सत्र

प्रथम तकनीकी सत्र का सार-संक्षेप

प्रथम तकनीकी सत्र में मुख्य वक्ता प्रो. आर.पी. तिवारी (कुलपति, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, चंडीगढ़) ने “राष्ट्रीय शिक्षा नीति का क्रियान्वयन” विषय पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका या भौतिक उपलब्धि तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह बौद्धिक, नैतिक और संपूर्ण जीवन के विकास के लिए होनी चाहिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने इन्हीं उद्देश्यों को अपनाते हुए मूल्यांकन के स्थान पर ‘समग्र आकलन’ (Holistic Assessment) तथा ‘शिक्षण अधिगम’ (Learning Approach) को प्राथमिकता दी है। प्रो. तिवारी ने शिक्षक नवाचार, छात्र-केंद्रित शिक्षण और “Co-Instructor Model” (20-20-20 फार्मूला) का उल्लेख किया, जिसमें संवाद एवं चर्चा पर बल है। उन्होंने “Open Book Examination” को आकलन का सर्वश्रेष्ठ उपाय बताया और ब्लूम्स टैक्सोनॉमी के छह शैक्षिक स्तरों को प्राचीन भारतीय गुरुकुल प्रणाली से जोड़ा। उनका मत था कि “क्या” पढ़ाया जाए से अधिक “कैसे” सिखाया जाए, इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है, ताकि विद्यार्थी आत्मनिर्भर और निपुण बन सकें। उन्होंने Multiple Entry & Exit एवं Academic Credit System जैसी व्यवस्थाओं को विद्यार्थी-केन्द्रित शिक्षा की दिशा में क्रांतिकारी कदम बताया तथा SWAYAM जैसे प्लेटफॉर्म, बहु-विषयी अध्ययन (Multi/Inter/Transdisciplinary) और Capacity Building के कार्यक्रमों की जानकारी दी। प्रो. तिवारी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को सभी पाठ्यक्रमों में शामिल किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति, केवल एक नीति न होकर भारत की खोई हुई शैक्षिक विरासत को पुनर्जीवित करने का पथ है और यह भविष्य के विकसित भारत के निर्माण का अवसर प्रदान करती है।

द्वितीय तकनीकी सत्र का सार-संक्षेप

द्वितीय तकनीकी सत्र में मुख्य वक्ता श्री दर्शन मारू (परीक्षा नियंत्रक, गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, वड़ोदरा) ने राष्ट्रीय क्रेडिट रूपरेखा (National क्रेडिट Framework – NCrF) और इसके कार्यान्वयन पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में स्थापित शिक्षा आयोगों की पृष्ठभूमि बताई और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत हुए मूलभूत संरचनात्मक परिवर्तनों पर प्रकाश डाला। श्री मारू ने बताया कि 10 अप्रैल 2023 को निर्मलजीत सिंह कलसी की अध्यक्षता में NCrF लागू हुआ, जो भारत में पढ़ाई के क्रेडिट सिस्टम को एकीकृत करता है। यह प्रणाली स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा, और व्यावसायिक/तकनीकी शिक्षा के क्रेडिट को एक ही Academic Credit Bank में जमा कर विद्यार्थियों को Multiple Entry & Exit और विभिन्न पाठ्यक्रमों को क्रेडिट के आधार पर जोड़ने की सुविधा देता है। NCrF के तहत क्रेडिट की गणना शैक्षणिक कक्षाएं, प्रयोगशालाएं, अनुभवात्मक अधिगम, परियोजनाएं, परीक्षाएं, वाद-विवाद, सांस्कृतिक गतिविधियाँ, आत्मरक्षा कक्षाएं आदि के आधार पर की जाती है। यह एक पारदर्शी एवं समन्वित व्यवस्था प्रदान करता है जिससे शिक्षा गुणवत्ता में सुधार होगा और विद्यार्थियों को लचीली, बहुआयामी शिक्षा के अवसर मिलेंगे। उन्होंने बताया कि प्रत्येक विश्वविद्यालय और महाविद्यालय में NEP समन्वयक नियुक्त किया जाना आवश्यक है, जो नीति के प्रभावी क्रियान्वयन का पर्यवेक्षण करेगा। इस सत्र ने भारत के युवा शक्ति के संदर्भ में शिक्षा और कौशल विकास को एकीकृत करने और नई राष्ट्रीय शैक्षिक क्रेडिट व्यवस्था के माध्यम से सीखने के रास्तों को लचीला बनाने के महत्व को सामने रखा।

समापन सत्र में राष्ट्रीय शिक्षा नीति क्रियान्वयन के पूर्व संयोजक प्रो आशीष भटनागर ने कहा कि कोर्स निर्माण के समय लर्निंग आउटकम का ध्यान रखना आवश्यक है ।

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