भारत भूमि (अजमेर)— भगवान शिव आदि और अनादि है। शिव की पूजा में किसी भी प्रकार की कोई केवल जीव के प्रेम और विश्वास से ही प्रसन्न हो जाते हैजाति पांति ऊच नीच का भेद नहीं है। शिव की आराधना के लिए कठोर तब और जब करने की जरूरत नहीं है। वे केवल जीव के प्रेम और विश्वास से ही प्रसन्न हो जाते है।
गुलाबबाड़ी स्थित तेजाजी की देवली मंदिर परिसर में शिव महापुराण कथा के दौरान श्रद्धालुओं को संबोधति करते हुए सुप्रसिद्ध भागवत भूषण कथा वाचक रामस्नेही संप्रदाय के युवा संत उत्तमराम शास्त्री ने कहे। उन्होंने कहा कि भगवान हमेशा उपलब्ध लेते है और याद तो करो। भगवान की पूजा अर्चना करने के लिए मंत्र, मूर्ति माला और गुरु । मंत्र एक करोड़ से ज्यादा होगा तो मंत्र प्रभावी होगा। भक्ति विश्वास पर टिकी हुई है। जिसका पक्का विश्वास होगा उसकी पूजा सिद्ध होगा. इष्ट एक हो पर सम्मान सभी का होना चाहिए। जिस माला को जपते हो तो उसी को जीवन भर साथ रखो। मूर्ति भी एक ही होनी चाहिए। मूर्ति भी बदलो मत। निष्ठा एक रखे एक मंत्र की साधना करते जो गुरु द्वारा दिया गया। वही मंत्र का जाप करे तभी वह सिद्ध होगा। जीव को एक ही मंत्र का जाप करना चाहिए। एक मुखी रुद्धाक्ष धारण करने से उसका दर्शन करने से भक्ति और मुक्ति ंिमलती है। इस प्रकार महाराज ने रुद्धाक्ष के रुपो और धारण करने के बारे में कई महत्वपूर्ण बाते बताई। महाराज ने कहा कि कथा के दौरान कथा और सत्संग में सत्सग ही होना चाहिए व्यर्थ की बाते होती है तो वह कुसत्संग हो होता है। साधना के तीन मार्ग बाते है। पहले पूजन करे और आपसे पूजन नहीं होता है तो सत्संग करे और सत्संग भी ना हो तो साधना करते नाम जाप करे इससे आपको भक्ति प्राप्ति होगी और आपके मोक्ष का मार्ग खुलेगा। इस दौरान भजन गायको ने एक से बढ़कर एक भजनों की प्रस्तुति देकर माहौल भक्तिमय कर दिया। आज के मुख्य यजमान ने पूजा अर्चना की और प्रसाद वितरण किया।
