भारत भूमि (सम्पादक – प्रदीप टिक्यानी)
भारत भूमि (अजमेर) : सनातन धर्म रक्षा संघ अजयमेरू राजस्थान, अंतर्राष्ट्रीय साहित्य परिषद, प्रथम–एक पहल और कला विकास समिति के संयुक्त तत्वावधान में गुरुवार, 4 सितंबर को प्रेम प्रकाश आश्रम में गुरु सम्मान समारोह का भव्य आयोजन किया गया। इस समारोह की अध्यक्षता महानिर्वाणी अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर परमहंस स्वामी विशोकानंद भारती जी महाराज ने की। उन्होंने अपने करकमलों से शिक्षकों को सम्मानित कर समाज में शिक्षा और संस्कारों की महत्ता पर ज़ोर दिया।
कार्यक्रम का आरंभ
कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक तरीके से हुई, जिसमें श्रीमती कृष्णा शर्मा ने तिलक और विजय कुमार शर्मा ने उपर्णा अर्पित किया। चंद्रभान प्रजापति ने महागुरु को मोती की माला पहनाकर उनका स्वागत किया। समारोह का प्रारंभिक संचालन जज साहब ने किया, जबकि मुख्य संचालन का दायित्व विजय कुमार शर्मा ने संभाला।
शिक्षकों का सम्मान
इस समारोह में महिला और पुरुष शिक्षकों को वरीयता क्रम से सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वाले शिक्षकों में अक्षय परिहार, दिनेश झांकल, लता मिश्रा, योगेश्वरी शर्मा, संजय जैन, मीना शर्मा, नरेश कुमार, राजेश व्यास, राजीव मिश्रा, राम भरोसी, रंजना शर्मा, सरला शर्मा, विद्या शास्त्री, ख्याति अरोड़ा, डॉ. अतुल दुबे, राजेश्वरी किशनानी, डॉ. रश्मि शर्मा, उर्वशी भगचंदानी, डॉ. गायत्री शर्मा, डॉ. दीपा थदानी, रमा शर्मा, राजेंद्र सरस्वत, प्रताप सिंह, डॉ. शारदा देवड़ा, और पंकज शर्मा सहित कई अन्य शिक्षक शामिल थे।
इसके अलावा, ज्ञान सारस्वत, कंवल प्रकाश किशनानी, चंद्रभान प्रजापति, गोपेश दुबे, नरोत्तम शर्मा, विजय कुमार शर्मा, कमल चारण, और देवेंद्र त्रिपाठी को भी महागुरु ने विशेष रूप से सम्मानित किया।
महागुरु का उद्बोधन
अपने संबोधन में आचार्य महामंडलेश्वर परमहंस स्वामी विशोकानंद भारती ने कहा कि गुरु ही जीवन में प्रकाश का स्रोत हैं। उन्होंने कहा कि आज के समय में शिक्षा को सिर्फ डिग्री और रोजगार तक सीमित कर दिया गया है, जबकि इसका वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को मूल्यों, आचरण और धर्म से जोड़ना है। उन्होंने शिक्षकों से आह्वान किया कि वे केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि विद्यार्थियों में संस्कार भी जगाएँ।
इस आयोजन को सफल बनाने में शिखा शर्मा, राजमल प्रजापति, हेमंत वर्मा, और संजय कुमार ने सक्रिय सहयोग दिया। गुरुजनों के इस सम्मान से न केवल वे गौरवान्वित हुए, बल्कि समाज में शिक्षा और संस्कार की प्रतिष्ठा भी पुनः स्थापित हुई।
